Sunday, 16 December 2012

khidaki aur darwaaze ke darmyiaan

खिड़की और दरवाज़े के दर्मियाँ 

अबकी बरस की 
पूरनमासी वाली रात ,
हाँ, उसी सर्द रात को,
प्रेमचंद वाली पूस की रात से 
थोडा जियादा सर्द रात को 
खिड़की और दरवाज़े के दरम्यान 
वक़्त तराशा था , जब बैठा था ।
खिड़की के उस पार दिखे थे 
दिन गिरते उठते बचपन के 
और गौर से देखा , पाया  
झूले पे अंगड़ाते सावन को  
एक अचानक आहट आई 
दरवाज़े पर मानो टूटा हो 
वक़्त का टुकड़ा अभी अभी 
मुड़कर पीछे देखा पाया 
घर की बिल्ली गिरा गयी थी 
गेंदे वाला मिट्टी का गमला 
इसी फेर में बिखरा गयी थी 
उन फूलो को फर्श पर जो कभी 
गमलो में अटके हुआ करते थे ,
टुकुर टुकुर देखा करते थे ।
निकली छोटी सी आह 
मानो रुक ही ना पाई हो 
कोशिश करके रुकते-रुकते भी ।
मानो छलक पड़ी हो 
कोशिश करके रिसते रिसते ही ।
वापिस खिड़की से जब झाँका 
नज़र गायब थी ,
नज़र ओझल थी ।
खिड़की और दरवाज़े के दरम्यान 
दूरी बहुत थी 
फ़ासले तमाम थे।
खालीपन पसरा बैठा था ,
खुद से मेरा संवाद रुका था।
तभी कहीं से आई हँसती 
बीच बीच में शोर मचाती 
लड़ लेतीं पहले आपस में 
अब देखो हैं रोती गाती ।
ये सखियाँ हैं उड़ी कहाँ से 
ये सखियाँ उड़ चली कहाँ तक 
ये सखियाँ हैं कोई फ़रिश्ते 
यहीं दरमियां मंतर पढ़ती 
यहीं दरमियां कलमे गातीं 
खिड़की से हैं आती-जाती 
दरवाज़े से जाती-आती 
सोंधा करते यही दर्मियाँ 
ये कानों में कहती जातीं -
गुजरा वक़्त खिड़कियों से दिखता है 
गुजरे वक़्त के दरवाज़े नहीं खुलते ।
खिड़की और दरवाज़े के दर्मियाँ 
गुजरा वक़्त तराशा था, जब बैठा था।
                            -निशांत 


Saturday, 3 November 2012

हकीक़त

एक कोने में बैठे हुए उसे कई बार देखा था । वहां एक बार किसी सिलसिले में आना हुआ था , तभी पहली बार उस पर नज़र पड़ी थी । फिर साल में एकाधे बार उससे मिलने के लिए चला जाया करता था । जाता जरुर था मिलने के लिए मगर कदम उसकी कोठरी के दरवाजे से आगे नहीं बढ़ पाते  थे। कभी वो थोडा गंभीर दीखता था तो कभी कभार कुछ ग़मगीन भी । और मैंने देखा था कि बीच बीच में टहल लिया करता था , शायद जब ख़यालात कम पड़  जाते होंगे तब । हाँ एक बात तय ज़रूर थी और वो ये कि वो जब भी दीखता था तो कोने वाले उसी झरोखे के नज़दीक दीखता था । हो सकता है इसलिए बैठता होगा कि वहां हवा के हलके झोंके रोशनदान से होते हुए दूर कही से किसी का दर्द छुपाये लाते  हों । या फिर इसलिए कि रोशन दान की सलाखो पे लटका हुआ वो चीथड  बौराई हवाओ में ऐसे छटपटाता था , मानो  नन्हे कबूतर ने अपने पंख फड़फड़।ये  हो अभी अभी । इन्ही सब आवाजों को पसीजकर उड़ेल दिया करता होगा अल्फाजों के सांचे  में और बना दिया करता होगा एक नयी नज़्म ।
     आप पूछेंगे की आखिर वो था कौन ? तो , वो एक शायर था । अपने कमरे में खुद से  क़ैद एक शायर । बाज़ार में जब जाता तो लोग उसे बेवकूफ समझते । खरीद फरोख्त के आम तरीके भी तो नहीं आते थे उसे। नज्मो में मात्राओ की नाप तोल करने में इतना मशगूल रह गया कि दुनिया की रस्मे सीखना भूल ही गया शायद। आखिर वो शायर था , कमरे में क़ैद एक शायर।
     उस रोज़ मै उसके कमरे के तरफ से इस मकसद से गुजरा ,जान बूझकर , कि आज उससे रूबरू होकर रहूँगा। उससे पूछूँगा कि आखिर उस काली अँधेरी कोठरी में घुटन नहीं होती होगी उसे? जंजीरों से जकड़ा हुआ नहीं महसूस करता होगा वो? मरीजो की तरह खिड़की के बाहर बेचारगी में आखिर क्या झाँकने की कोशिश करता रहता है वो? 
     बड़े जोश के साथ कमरे में घुसा तो पाया कि वो ज़मीन पर लेटा हुआ था , वो भी औंधे मुँह । उसकी नज्मे पुराने , पीले कागजों पर सवार होकर नाच रही थी कमरे में इधर उधर । और करीब गया तो देखा की हरकत  नहीं थी । धड़कने बंद थी , साँसे चल नहीं रही थी और मुँह  सूख गया था। सारा बदन अकड़  गया था , पेट इतना अन्दर था कि  मानो हफ्तों से अनाज पहुँचही न हो वहां तक । फड़फड़।ते हुए फाखते की तरह उडाता हुआ एक पन्ना आया और उसके चेहरे से चिपक गया । मुझे मह्सूस हुआ कि  वो बंद कमरे वाला शायर मुझसे कह रहा हो , मैं  वो नहीं जिसे तुम घूर रहे हो , जो चिपक गया अभी अभी- वो मेरा चेहरा है, वही हकीकत है मेरी ।
     चूँकि मै एक लाश से सवाल जवाब नहीं कर  सकता था इसलिए रूबरू होने का मेरा जोश उसी ठंडी लाश के जैसे ठंडा हो गया। जब उसे कब्र में गाड़ने की बारी आई तो मैंने उसकी कोठरी से बटोरे हुए पन्ने , वहां से ज़ब्त चंद तसवीरें और उसकी दवात साथ में दफ़न करवा दी ।कलम तो उसके हाथो में ही थी , मरने के बाद भी वो छूटी कहाँ थी। क्या कमाल का शायर रहा होगा  वो !
      उसकी अंतिम रस्म में भी दो या तीन लोग ही मौजूद थे और अंत में तो सिर्फ अकेला मैं ।खोदने वाले ने आकर मुझसे मेहनताना माँगा क्योकि और कोई उसका रिश्तेदार वहाँ मौजूद नही था। दो सौ रुपये मांगे थे , देने के लिए जेब टटोली ।जेब खाली थी।सुबह के वक़्त शायद जल्दी जल्दी में बटुआ रखना ही भूल गया था । नज़रें उठायीं कुछ देर में तो उसे दबी जुबान में गालियाँ देते हुए जाते पाया।हालांकि उसके जाते जाते मैंने ये वादा  तो उसे कर ही दिया कि घर से आते वक़्त उसके पैसे दे दूंगा । मेरी इस बात को वो किसी सियासी वादे के जैसा मानता हुआ निकल गया, बिना मेरी और कोई ध्यान दिए। 
      घर लौटते वक़्त मैं आस पास पसरी हुई अनचाही ख़ामोशी में अपने उन्ही सवालो के जवाब टटोलने की कोशिश कर रहा था । मिले नहीं , बल्कि और उलझते चले गए ।आखिर वो खुद मे कैद रहकर क्या ढूँढता था उस रोशन दान से  झांक कर ?
      शायद यही सवाल रहे हो उसके मन में भी या फिर हो सकता है वो मेरे लिए इन सवालों के जवाब ढूँढता रहता हो ।
     ख़ैर , सामने देखा तो मेरा प्यारा-सा घर किसी बिरही प्रेयसी की तरह मेरा इंतज़ार कर रहा था।

Tuesday, 2 October 2012

swadeshi ka aaj


गाँधी जी और शास्त्री जी की  जयंती पर उनके स्वदेशी मूल्यों की आज की तारीख़ में होती बदहाली पर मैंने थोड़ी कलम चलाई है .....

चौपाल पर बड़ी भीड़ थी ।
 विपक्षी पार्टी के छुटभैये लोकल नेता शहर से अपनी पार्टी के  अधिवेशन से बड़े जोश से लौटे तो चौपाल पे धर लिए गए। लगे झाड़ने  आदर्श के जितने खाली  खोखे,  भर के समेट  के ला पाए थे।

 " बड़े नेताजी लोग कहे है कि हम लोगो को नयी आज़ादी के लिए फिर से लड़ाई करनी पड़ेगी । अबकी स्वदेशी और ... "

एक आदमी बड़ा असहमत होकर बोला -
" क्या भारत हमारा ही देश है, जो उसके लिए लड़ें ?"

"ये कैसा सवाल है ! आखिर हम जिस देश में रहते हैं वही तो है न भारत , और भारत क्यों कहते हो ? जानते नहीं ,भारत नही अब इसे इंडिया कहते हैं । "
                                                            ------------ निशान्त सिंह

बेहतर होता कि  हम 2 अक्टूबर को स्वदेशी दिवस के रूप में मनाते , और इस तरह  दोनों महापुरुषों के विचारो को महत्त्व देते, न कि उनके जन्मदिन को छुट्टी के दिन की तरह बिता देते।
खैर छोडिये ... आप तो सहवाग को गलत शॉट खेलने के लिए गालियाँ  देने में व्यस्त हैं ।
अभी