Thursday, 31 October 2013

झुंझलाहट

किसी खाली कमरे में गूँजता 
अस्पष्ट वाक्य
मैं ....
स्वयं की प्रतिध्वनि से 
अधूरा होकर झुंझलाता 
लाठी भांज रहा हूँ
एक ढांचे पर
जिसने कैद किया रखा है |

अब कुछ देर में ये टूटेगा
और गिरेगा
धम्म से !
जैसे सरकारी विद्यालय का छात्र कोई
दंड भोगता -
- कान पकड़ कर खड़ा रहा हो
कई साल से !
अब लोट गया है थककर,
औंधे बदन
और मुँह खुल गया है
पैर पसर गए हैं दूर-दूर ,
निश्चित ही निश्चेत पड़ा है !

चेतना गूँज रही है
अब खुले आसमान के नीचे |