गाँधी जी और शास्त्री जी की जयंती पर उनके स्वदेशी मूल्यों की आज की तारीख़ में होती बदहाली पर मैंने थोड़ी कलम चलाई है .....
चौपाल पर बड़ी भीड़ थी ।
विपक्षी पार्टी के छुटभैये लोकल नेता शहर से अपनी पार्टी के अधिवेशन से बड़े जोश से लौटे तो चौपाल पे धर लिए गए। लगे झाड़ने आदर्श के जितने खाली खोखे, भर के समेट के ला पाए थे।
" बड़े नेताजी लोग कहे है कि हम लोगो को नयी आज़ादी के लिए फिर से लड़ाई करनी पड़ेगी । अबकी स्वदेशी और ... "
एक आदमी बड़ा असहमत होकर बोला -
" क्या भारत हमारा ही देश है, जो उसके लिए लड़ें ?"
"ये कैसा सवाल है ! आखिर हम जिस देश में रहते हैं वही तो है न भारत , और भारत क्यों कहते हो ? जानते नहीं ,भारत नही अब इसे इंडिया कहते हैं । "
------------ निशान्त सिंह
बेहतर होता कि हम 2 अक्टूबर को स्वदेशी दिवस के रूप में मनाते , और इस तरह दोनों महापुरुषों के विचारो को महत्त्व देते, न कि उनके जन्मदिन को छुट्टी के दिन की तरह बिता देते।
खैर छोडिये ... आप तो सहवाग को गलत शॉट खेलने के लिए गालियाँ देने में व्यस्त हैं ।
अभी