एक मई
आज एक मई है , अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस है । श्रमिकों ने अपने अधिकार के लिए जो आन्दोलन किये हैं और जो आन्दोलन वे आज भी कर रहे हैं - ये दिन उनके उस संघर्ष को समर्पित है । ये दिन इस बात की आशा में मनाया जाता है कि भविष्य श्रमिकों के लिए बेहतर जीवन लेकर आएगा । जो भद्दी ज़िंदगी सामाजिक वर्गों के वर्गीकरण से पैदा हुई है और आज भी मन मसोस कर श्रमिक जिसे जी रहा है , वो शायद एक दिन ख़तम होगी ।
इतिहास का पर्दा , वर्ग संघर्ष के प्रतीक इस दिन पर घटित हुए न जाने कितने दंगों में कुर्बान हुई न जाने कितनी जिंदगियो के खून से सना हुआ है । ओहिओ में १८९४ और १९१९ के दंगे इस सिलसिले में एक नजीर हैं । यूँ भी , देखा जाये तो बीसवी सदी में मानवता ने हिंसा के इतने गहरे घाव झेले हैं कि उन्हें भरना मुमकिन नहीं है ।
वैसे तो जब शिकागो में श्रमिकों के आन्दोलन ने इस दिन की नींव डाली थी और इस के लिए अमेरिका की अदालत में सुनवाई हुई थी तब राजविप्लववादी (अंग्रेजी में ANARCHIST ) ग्रिनेल ने कहा था कि ये सत्ता की खिलाफत पर मुक़दमा है ।
लेकिन आजकल देखा गया है कि ऐसे मौकों का उपयोग राजनैतिक पार्टी वगैरह के नेता और उनके चेला-चप्पड़ फ़िज़ूल के भाषण देने और बेरोजगार भीड़ को बरगलाने के लिए करते हैं । ये बात भी ज्यादा अटपटी नहीं लगती कि लोग इस तारीख के असली अर्थ से अनजान रखे गए हैं । आखिर राजविप्लववाद को मान्यता दें या मार्क्स को ? असल बात तो ये है कि न ही मार्क्सवाद और न ही कोई अन्य विचारधारा वर्ग-संघर्ष का संतोषजनक समाधान दे सकी है ।
१ मई हर साल आती है लेकिन हम उस दिन को श्रमिक के योगदान की कोरी बातें कर के बिता देते हैं । १ मई की कोई सार्थकता तब तक नहीं है जब तक हम वर्ग-संघर्ष की चक्की में गेंहू की तरह पिसते श्रमिक को ही दरकिनार रखते हुए महज मंच से उनके उत्थान की लम्बी लम्बी हांकते रहें ।