Thursday, 31 October 2013

झुंझलाहट

किसी खाली कमरे में गूँजता 
अस्पष्ट वाक्य
मैं ....
स्वयं की प्रतिध्वनि से 
अधूरा होकर झुंझलाता 
लाठी भांज रहा हूँ
एक ढांचे पर
जिसने कैद किया रखा है |

अब कुछ देर में ये टूटेगा
और गिरेगा
धम्म से !
जैसे सरकारी विद्यालय का छात्र कोई
दंड भोगता -
- कान पकड़ कर खड़ा रहा हो
कई साल से !
अब लोट गया है थककर,
औंधे बदन
और मुँह खुल गया है
पैर पसर गए हैं दूर-दूर ,
निश्चित ही निश्चेत पड़ा है !

चेतना गूँज रही है
अब खुले आसमान के नीचे |

Thursday, 22 August 2013

“ पिंकी है पैसे वालों की !!!

“ पिंकी है पैसे वालों की !!!

कैंटीन में चाय की चुस्कियां लेते हुए एक संगीतप्रधान दूरदर्शन केन्द्र पर या फिर यूट्यूब का मुखपृष्ठ खोलते ही सब्सक्राइब्ड चैनेल के मशविरों में एक गीत कुछ चर्चित-सा होता लगता है | एक अभिनेत्री हैं मुम्बईया उद्योग में जो देसी गर्ल से देसी बारगर्ल बनकर कुछ इन शब्दों पर थिरकते हुए मनोरंजन करने में प्रयासरत दिखती हैं –

“मुंबई की न दिल्ली वालों की , पिंकी है पैसे वालों की” और “पैसा फेंक तमाशा देख , नाचेगी पिंकी फुल्टू लेट” और न जाने क्या क्या !

नहीं ,मैं बजरंग दल या शिवसेना या मनसे या विहिप टाइप नहीं हूँ कि फिल्म पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए एक भड़काऊ और कट्टर लेख लिख डालूं लेकिन एक सवाल है जो कुलबुला रहा है अन्दर ही अन्दर जब से कानो में ये पंक्तियाँ गयी हैं | क्या ये संभव नहीं कि ये गीत मुंबई के डांस बार फिर से खुलने के निर्णय को कैश कराने के उद्देश्य से लिखा और प्रचारित किया गया है ? कुछ और सवाल हैं - क्या आपको गीत के बोलों में फिल्म के निर्माता और इससे जुड़े बाकी सभी लोगों की समाज के प्रति उदासीनता और निश्चिन्तता की बू नहीं आती, जो इस फिल्म की कीमत को किसी भी बहाने से बढ़ाना चाहते हैं ? क्या आपको नहीं लगता फिल्म सेंसर बोर्ड एक बिना सिद्धातों की संस्था है जिसका नियंत्रण फिल्मोद्योग के बड़े निर्माताओं के हाथ में है ? क्या छेड़छाड़ करने वाले शोहदों की बदतमीज़ी को असामाजिक कहना और इस तरह के भद्दे नाच को मनोरंजन कहते हुए पैसे की मोटी खाल से आँखों को ढककर शतुरमुर्ग बन जाना - हमारी खुद में उलझी हुई अस्पष्ट मानसिकता को नहीं दिखाता ? या फिर कहीं आप ये कहने वालों में से तो नहीं कि कुछ भी हो जाये ‘द शो मस्ट गो ओन’ ?

डांस बार का मामला क्या है ?

देखा जाये तो अब मुंबई के डांस बार दक्षिणपंथी विचारधारा और भारत गणराज्य की सांस्कृतिक पहचान पर उनके तथाकथित एकाधिकार के मध्य उभरते विसर्ग के अच्छे उदाहरण बन गये हैं | छद्म पाश्चात्य संस्कृति के भारतीय संस्करण के इन केन्द्रों के सबसे शुरुआती काल पर दृष्टि डालता हूँ तो पाता हूँ कि उस समय मराठा ह्रदय सम्राट बाला साहेब राजनीति में अपनी हवा बनाये हुए थे | जब शिवसेना के कार्यकर्त्ता उस समय टेलीविज़न ,पत्रिकाओं ,फ़िल्मों और यहाँ तक कि समाचार पत्रों को अश्लील कंटेंट से भरा बताते हुए मीडिया पर दादागिरी का नया साम्राज्य बना रहे थे , तब क्या डांस बार उन्हें सांस्कृतिक धरोहर लग रहे थे , जो उन्होंने इन ‘स्टेट ऑफ़ द आर्ट’ केन्द्रों को अपनी छत्र-छाया में आँचल ओढा लिया ?

शिवसेना को उद्धृत करके मैं दक्षिणपंथियों पे निशाना नहीं लगाना चाहता , लेकिन निश्चित रूप से उस समय डांस बार को फलते फूलते रहने देने का कारण और कुछ भी नहीं बल्कि उनके काले धन से होने वाली कमाई रही होगी | और इस बात से उनकी मानसिकता और सिद्धांतो के पालन में की गयी चूक उजागर हो जाती है | वैसे व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि निवर्तमान दल जनसंघ को छोड़कर भारत में दक्षिणपंथी राजनीति करने वाली सभी पार्टियाँ स्वयं ही अपने सिद्धान्तों के प्रति स्पष्ट नहीं है | मैं राजनीति की बात नहीं करूँगा , करूँगा उसी दोहरे मानदंड की बात जो सदियों से चली आ रही है और जो हम सब जानते हुए भी नहीं मानते हैं |

डांसबार के सम्बन्ध में जब सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय कुछ दिनों पहले आया तो मीडिया ने इस बात को बहुत कम तवज्जो दी कि किन कारणों से राज्य सरकार अपने निर्णय से न्यायमूर्तियों की पीठ को संतुष्ट नहीं कर सकी | अधिकतर चैनेल दिन भर ‘इन केन्द्रों पर क्या होता है’- उसका ही कोई विडियो चलाते रहे | नाचती हुई लडकियां और उनके बारे में न जाने क्या-क्या और कितना सच-झूठ ! संयोग से मैं उस समय मुंबई में ही था और वहां के कुछ ‘रंगीन मिजाज़ वाले शरीफ़’ लोगों से बात करके मैंने ये निष्कर्ष निकाला कि डांसबार उच्च वर्ग को ज्यादा प्रभावित नहीं करते ,बल्कि खतरा तो निम्न मध्यम वर्ग पर होता है | ऐसे आपको तमाम लोग मिल जायेंगे जो दिनभर की  कमाई को इन बार में जाकर फ़िल्मी तरीक़े से दो उँगलियों से उड़ाएंगे | वो कमाई जो शायद उन्होंने ऑटो चलाकर कमाई होगी या रोज़ाना कमाई वाला ऐसा ही कोई और कामधंधा करके |


इसमें कोई शक नहीं कि सरकार के निर्णय से बार में कार्यरत जनसंख्या का बड़ा हिस्सा वेश्यावृत्ति में जाने को मजबूर हो गया जिससे सरकार द्वारा दिए गए बार बंद किये जाने के उन कारणों का दम निकल गया , जो नैतिक आधारों पर टिके थे | उनके विस्थापन की जटिल समस्या का समाधान अंत तक नहीं ढूँढा जा सका |  

क्रमशः... 

Friday, 2 August 2013

मेरे काफ़िर

मेरे काफ़िर

यूँ तो बारिश में सुखाया कुछ नहीं जाता 
देखा मगर इस काम में मशगूल काफ़ी हैं |

शाफ़ा बांधकर आया , मस्जिद में जो आया 
बात इतनी है कि इसमें पाकसाफ़ी है !

जो नहीं देखा, 'वो है'- कभी मानो नहीं 
अब तो रूह का बेपर्द होना भी नाकाफ़ी है |

सच्चाई के देखो अगर , पैमाने होते हैं 
सच बताने को काबिल झूठ काफ़ी है | 

कब से हूँ इक सुबह के इंतज़ार में 'नफ़स'
मिलने से पहले की ये काफ़िर रात काफ़ी है |






चश्मा

चश्मा 

बहुत आसाँ होता है कि बस आवाज़ कर दीजे
दी सभी को अक्ल है तो सोचना भी चाहिए |

धब्ब्बे स्याह हों फिर भी धुंधले पड़ ही जाते हैं
वक़्त का ना फ़र्क हो , कुछ तो ऐसा चाहिए |

मशगूल रहना ही ज़रूरी जब हो गया 'नफ़स'
रख के चश्मा आँख पर , कलम घिसते जाइये |


वाक़ये

वाक़ये


हो सकता है 
हुआ भी हो शायद !

गुस्ताख़ी के कुछ
करवटें बदलते वाक़ये रहे हों
कुछ तेज़ कदम चलने में
ज़मीं की धूल-से उभर आये हों !

हो सकता है 
हुआ भी हो शायद !

कुछ उनमें से अंधे रहे हों 
वाक़ये 
देख न पाए हो हक़ीक़त
या कि 
नज़र पर चश्मा रखना भूल गए हों !

हो सकता है 
हुआ भी हो शायद !

ज़ेहन में कुछ 
करछाते हों वाक़ये 
खुद की कब्र की 
मिट्टी 
आप लिए 
मुंह मीठा करा रहे हों 
खुश होकर !

हो सकता है 
हुआ भी हो शायद !

Tuesday, 30 April 2013

एक मई


एक मई 

आज एक मई है , अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस है । श्रमिकों ने अपने अधिकार के लिए जो आन्दोलन किये हैं और जो आन्दोलन वे आज भी कर रहे हैं - ये दिन उनके उस संघर्ष को समर्पित है । ये दिन इस बात की आशा में मनाया जाता है कि भविष्य श्रमिकों के लिए बेहतर जीवन लेकर आएगा । जो भद्दी ज़िंदगी सामाजिक वर्गों के वर्गीकरण से पैदा हुई है और आज भी मन मसोस कर श्रमिक जिसे जी रहा है , वो शायद  एक दिन ख़तम होगी ।


इतिहास का पर्दा , वर्ग संघर्ष के प्रतीक इस दिन पर घटित हुए न जाने कितने दंगों में कुर्बान हुई न जाने कितनी जिंदगियो के खून से सना हुआ है । ओहिओ  में  १८९४ और १९१९ के दंगे इस सिलसिले में एक नजीर हैं । यूँ भी , देखा जाये तो बीसवी सदी में मानवता ने हिंसा के इतने गहरे घाव झेले हैं कि उन्हें भरना मुमकिन नहीं है । 

वैसे तो जब शिकागो में श्रमिकों के आन्दोलन ने इस दिन की नींव डाली थी और इस के लिए अमेरिका की अदालत में सुनवाई हुई थी तब राजविप्लववादी (अंग्रेजी में ANARCHIST ) ग्रिनेल ने कहा था कि ये सत्ता की खिलाफत पर मुक़दमा है । 

लेकिन आजकल देखा गया है कि ऐसे मौकों का उपयोग राजनैतिक पार्टी वगैरह के नेता और उनके चेला-चप्पड़ फ़िज़ूल के भाषण देने और बेरोजगार भीड़ को बरगलाने के लिए करते हैं । ये बात भी ज्यादा अटपटी नहीं लगती कि लोग इस तारीख के असली अर्थ से अनजान रखे गए हैं । आखिर राजविप्लववाद को मान्यता दें या मार्क्स को ? असल बात तो ये है कि न ही मार्क्सवाद और न ही कोई अन्य विचारधारा वर्ग-संघर्ष का संतोषजनक समाधान दे सकी  है । 

१ मई हर साल आती है लेकिन हम उस दिन को श्रमिक के योगदान की कोरी बातें कर के बिता देते हैं । १ मई की कोई सार्थकता तब तक नहीं है जब तक हम वर्ग-संघर्ष की चक्की में गेंहू की तरह पिसते श्रमिक को ही दरकिनार रखते हुए महज मंच से उनके उत्थान की लम्बी लम्बी हांकते रहें ।


Sunday, 28 April 2013

happy ramnavami


हैप्पी रामनवमी 

आज रामनवमी है । त्रेतायुग में विष्णु के अवतार बनकर आये श्रीराम की जयन्ती । राम हिन्दुओं की आस्था के प्रतिरूप हैं । उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है । कहते हैं कि मर्यादा ,संयम और धैर्य का वैसा आदर्श हमें कहीं नहीं देखने को मिलता और निस्संदेह ऐसा है भी ।

लेकिन आज राम आस्था के प्रतीक कम , राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के मोहरे ज्यादा बन गए हैं ।राम के चरित्र की मुख्य विशेषता मर्यादा तो राम के तथाकथित भक्तों ने तभी तार तार कर दी थी , जब ६ दिसम्बर को अयोध्या की मर्यादा भूमि पर कारसेवकों द्वारा अमर्यादित उत्पात मचाया गया था , जिसे दुस्साहस कहना ज्यादा उचित होगा । ज्यों ही '  बच्चा बच्चा राम का , जन्मभूमि के नाम का ' के नारे गूंजे होंगे , त्यों ही राम अपने ' दूसरे बनवास ' को चल दिए होंगे ।

गांधी सुशासन को रामराज्य का पर्याय बताते थे । राम के नाम पर राज्य में फैला दुशासन देखते तो ' हे राम ! ' भी न कह पाते अंत में जाते जाते । रामनवमी पर राम की प्रतिमा पर फूल चाहे मत चढ़ाइए मंदिर में जा कर लेकिन मर्यादा के उनके आदर्श का कुछ अंश अपने अन्दर जरुर बचा लीजियेगा |

और फिर चाहे तो मोबाइल और फेसबुक पर ' हैप्पी रामनवमी ! ' कहते रहिएगा ।


-निशांत