“ पिंकी है पैसे वालों की !!! ”
कैंटीन में चाय की चुस्कियां लेते हुए एक
संगीतप्रधान दूरदर्शन केन्द्र पर या फिर यूट्यूब का मुखपृष्ठ खोलते ही सब्सक्राइब्ड
चैनेल के मशविरों में एक गीत कुछ चर्चित-सा होता लगता है | एक अभिनेत्री हैं
मुम्बईया उद्योग में जो देसी गर्ल से देसी बारगर्ल बनकर कुछ इन शब्दों पर थिरकते
हुए मनोरंजन करने में प्रयासरत दिखती हैं –
“मुंबई की न दिल्ली वालों की , पिंकी है
पैसे वालों की” और “पैसा फेंक तमाशा देख , नाचेगी पिंकी फुल्टू लेट” और न जाने
क्या क्या !
नहीं ,मैं बजरंग दल या शिवसेना या मनसे
या विहिप टाइप नहीं हूँ कि फिल्म पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए एक भड़काऊ और कट्टर लेख
लिख डालूं लेकिन एक सवाल है जो कुलबुला रहा है अन्दर ही अन्दर जब से कानो में ये
पंक्तियाँ गयी हैं | क्या ये संभव नहीं कि ये गीत मुंबई के डांस बार फिर से खुलने
के निर्णय को कैश कराने के उद्देश्य से लिखा और प्रचारित किया गया है ? कुछ और
सवाल हैं - क्या आपको गीत के बोलों में फिल्म के निर्माता और इससे जुड़े बाकी सभी लोगों
की समाज के प्रति उदासीनता और निश्चिन्तता की बू नहीं आती, जो इस फिल्म की कीमत को
किसी भी बहाने से बढ़ाना चाहते हैं ? क्या आपको नहीं लगता फिल्म सेंसर बोर्ड एक बिना
सिद्धातों की संस्था है जिसका नियंत्रण फिल्मोद्योग के बड़े निर्माताओं के हाथ में
है ? क्या छेड़छाड़ करने वाले शोहदों की बदतमीज़ी को असामाजिक कहना और इस तरह के
भद्दे नाच को मनोरंजन कहते हुए पैसे की मोटी खाल से आँखों को ढककर शतुरमुर्ग बन जाना
- हमारी खुद में उलझी हुई अस्पष्ट मानसिकता को नहीं दिखाता ? या फिर कहीं आप ये
कहने वालों में से तो नहीं कि कुछ भी हो जाये ‘द शो मस्ट गो ओन’ ?
डांस बार का मामला क्या है ?
देखा जाये तो अब मुंबई के डांस बार
दक्षिणपंथी विचारधारा और भारत गणराज्य की सांस्कृतिक पहचान पर उनके तथाकथित
एकाधिकार के मध्य उभरते विसर्ग के अच्छे उदाहरण बन गये हैं | छद्म पाश्चात्य संस्कृति
के भारतीय संस्करण के इन केन्द्रों के सबसे शुरुआती काल पर दृष्टि डालता हूँ तो पाता
हूँ कि उस समय मराठा ह्रदय सम्राट बाला साहेब राजनीति में अपनी हवा बनाये हुए थे |
जब शिवसेना के कार्यकर्त्ता उस समय टेलीविज़न ,पत्रिकाओं ,फ़िल्मों और यहाँ तक कि समाचार
पत्रों को अश्लील कंटेंट से भरा बताते हुए मीडिया पर दादागिरी का नया साम्राज्य
बना रहे थे , तब क्या डांस बार उन्हें सांस्कृतिक धरोहर लग रहे थे , जो उन्होंने
इन ‘स्टेट ऑफ़ द आर्ट’ केन्द्रों को अपनी छत्र-छाया में आँचल ओढा लिया ?
शिवसेना को उद्धृत करके मैं
दक्षिणपंथियों पे निशाना नहीं लगाना चाहता , लेकिन निश्चित रूप से उस समय डांस बार
को फलते फूलते रहने देने का कारण और कुछ भी नहीं बल्कि उनके काले धन से होने वाली
कमाई रही होगी | और इस बात से उनकी मानसिकता और सिद्धांतो के पालन में की गयी चूक
उजागर हो जाती है | वैसे व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि निवर्तमान दल जनसंघ को
छोड़कर भारत में दक्षिणपंथी राजनीति करने वाली सभी पार्टियाँ स्वयं ही अपने
सिद्धान्तों के प्रति स्पष्ट नहीं है | मैं राजनीति की बात नहीं करूँगा , करूँगा
उसी दोहरे मानदंड की बात जो सदियों से चली आ रही है और जो हम सब जानते हुए भी नहीं
मानते हैं |
डांसबार के सम्बन्ध में जब सर्वोच्च
न्यायालय का निर्णय कुछ दिनों पहले आया तो मीडिया ने इस बात को बहुत कम तवज्जो दी
कि किन कारणों से राज्य सरकार अपने निर्णय से न्यायमूर्तियों की पीठ को संतुष्ट
नहीं कर सकी | अधिकतर चैनेल दिन भर ‘इन केन्द्रों पर क्या होता है’- उसका ही कोई
विडियो चलाते रहे | नाचती हुई लडकियां और उनके बारे में न जाने क्या-क्या और कितना
सच-झूठ ! संयोग से मैं उस समय मुंबई में ही था और वहां के कुछ ‘रंगीन मिजाज़ वाले
शरीफ़’ लोगों से बात करके मैंने ये निष्कर्ष निकाला कि डांसबार उच्च वर्ग को ज्यादा
प्रभावित नहीं करते ,बल्कि खतरा तो निम्न मध्यम वर्ग पर होता है | ऐसे आपको तमाम
लोग मिल जायेंगे जो दिनभर की कमाई को इन
बार में जाकर फ़िल्मी तरीक़े से दो उँगलियों से उड़ाएंगे | वो कमाई जो शायद उन्होंने
ऑटो चलाकर कमाई होगी या रोज़ाना कमाई वाला ऐसा ही कोई और कामधंधा करके |
इसमें कोई शक नहीं कि सरकार के निर्णय से
बार में कार्यरत जनसंख्या का बड़ा हिस्सा वेश्यावृत्ति में जाने को मजबूर हो गया
जिससे सरकार द्वारा दिए गए बार बंद किये जाने के उन कारणों का दम निकल गया , जो नैतिक
आधारों पर टिके थे | उनके विस्थापन की जटिल समस्या का समाधान अंत तक नहीं ढूँढा जा
सका |
क्रमशः...