Saturday, 23 February 2013

तमस देखकर फ़ौरन

तमस देखकर फ़ौरन 

तमस , एक ऐसा सिनेमा कि जो दर्शक के लिए परदे पर स्वाभाविकता , यथार्थता और संवेदना - तीनो का एक साथ बेहद नायाब और उतना ही दुर्लभ बिम्ब खींचता है । यद्यपि पांच घंटे के लगभग की अवधि के कारण फिल्म को देखने से पहले मन को दृढ अवश्य करना पड़ा लेकिन प्रारंभ से अंत तक कोई भी ऐसा हिस्सा नहीं है कि जहाँ कथानक उबाऊ सा लगने लगे या गत्यात्मकता बाधित प्रतीत हो। उंगलियाँ टचपैड पर गयी भी तो बैक बटन के लिए । 

एक संवाद आता है लगभग अंत में जिसमे दंगा पीड़ितों के रिकॉर्ड दर्ज करने वाले अधिकारी से कोई कहता है कि - " इसमें एक कॉलम और जोड़ दो , पीड़ित इंसान - गरीब था या अमीर , क्योकि तभी तुम ये जान पाओगे कि ऐसे दंगे फसाद में हिन्दू या मुसलमान कम - ज्यादा नहीं मरते बल्कि सबसे ज्यादा गरीब मरते हैं ।

ओम पुरी साहब के लिए सम्मान पहले से दसियों गुना हो गया इन पांच घंटो के बाद  , विशेष रूप से उनके सुनसान जगह पर मदद के लिए भागने वाला दृश्य तो ऐसा है की कई बार रिवाइंड करके देखने से नहीं रोक पाया खुद को ।

कथानक में राजनीतिक परिवेश को भी लोकल स्तर तक सीमित रखा गया है जिससे प्रभाव और सटीक पड़ता है , और पैना पड़ता है | ये कुछ कुछ वैसा ही प्रयोग है जैसा फणीश्वर नाथ रेणु ने " मैला आँचल " में  उस समय मौजूद भिन्न  भिन्न सियासी दलो के आपसी तकरार की प्रस्तुति एक छोटे से गाँव में व्यंग्य रूप में करने में किया है ।

 कहना चाहूँ तो बहुत सारा कहता रहूँ लेकिन , इत्यलम  ।


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