मेरे काफ़िर
यूँ तो बारिश में सुखाया कुछ नहीं जाता
देखा मगर इस काम में मशगूल काफ़ी हैं |
शाफ़ा बांधकर आया , मस्जिद में जो आया
बात इतनी है कि इसमें पाकसाफ़ी है !
जो नहीं देखा, 'वो है'- कभी मानो नहीं
अब तो रूह का बेपर्द होना भी नाकाफ़ी है |
सच्चाई के देखो अगर , पैमाने होते हैं
सच बताने को काबिल झूठ काफ़ी है |
कब से हूँ इक सुबह के इंतज़ार में 'नफ़स'
मिलने से पहले की ये काफ़िर रात काफ़ी है |
लाजवाब मेरे भाई .... बहुत खूब ,
ReplyDeleteसुन्दर और सहज और भावयुक्त और अनोखा ...
और कितने ही और जोड़कर लिख दूं ..
नाकाफी है .....
आप कि दुआएं मिलती रहें तो कोई मुक़ाम काफ़ी नहीं रह जायेगा , शुक्रिया
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